Saturday, September 12, 2009

गणेश चतुर्थी : होली और दिवाली एक साथ

गणेश चतुर्थी : होली और दिवाली एक साथ .
सुबह का समय था ..करीब सात बजे होंगे की ऐसा लगा की कोई दरवाज़े पैर ख़त कहता रहा है . जो उठ कर देखा तो छोटे छोटे बचे चुट पुटिया पाटाकों से खेल रहे थे ..कुछ समय बीता और हम भी दिनचर्या में लग गए क्यूँ की छुट्टी थी इस लिए घर का काम कुछ जादा था और साफ़ सफाई भी करनी थी..इधर मन भूल ही गया था की आज त्योहार है की तभी बच्चों की एक टोली घर के दरवाज़े पैर आ कर शोर मचने लगी बहर निकले तो पता चला उन्हें चंदा चाहिए था ..दिया ..दिया ही नहीं हलकी उनके सात कब कैसे काम में लग गए पता ही नहीं चला कभी कुछ सामग्री लाना तो कभी बिजली के तर लगाना ..कब दोपहर से शाम हो गयी पतः इ नहीं चला ..और शाम के वक़्त तो क्या बातें जैसे पूरी बिल्डिंग जगमगा उठी ..साथ ही दृश कुछ ऐसा था मनो लोग होली दिवाली सब एक सात मन रहे हों..पहले लोगों ने खूब पटाके फोडे फिर क्कुह ही देर में रंग खेलने लगे ..अब रंग भी ऐसे वैसे नहीं भल्की पुरे जोर से पानी के साथ...कुछ ही देर में लोगों ने मटकियाँ लटका दी और फिर क्या छोटे छोटे बचों को बारी बारी मौका दिया जाने लगा मटकियाँ फोड़ने का ..पैर वो उनसे कहाँ फूटती ..जैसे ही कोई बचा वार करता एक बड़ा आदमी मटकी को डोर से ऊपर खींच लेता ..बाद में कोई बड़ा लड़का ही मटकी फोरता..जैसे ही मटकी फूटती उससे कुछ सिक्के गिरते और बचे उन्हें बटोरते ..वाह क्या बताएं पूरी होली दिवाली सब एक ही बार में आनंद हुआ

Thursday, July 2, 2009

ये ईंट पत्थरों के जंगल

मुंबई, दिल्ली, बंगलोर, पुणे और हैदराबाद में एक समान्ता है. इन जगहों पर घोर घने जंगल हैं पर ये कोई आम जंगल नहीं हैं ये हैं ईंट पत्थरों के जंगल जहाँ तक नज़र जाती है दिखाई पड़ती हैं तो बस बड़ी बड़ी बहुमंज़ली इमारतें..अन्य प्रसिद्ध प्रजातियाँ जैसे मल्टीप्लेक्स, मॉल,होटल इत्य आदि , खैर गम इस बात का नहीं है की ये जंगल फलते ही जा रहे हैं..और अब इनकी चपेट में छोटे सहर भी आ चुके हैं वरन इस बात का है की सर्कार..उद्योगपति और अन्य लोग जो इन जंगलों को बढाने में लगे हैं वह थोरा बस थोरा सा ध्यान व् धन उन पर भी लगा देते जो भुकमरी से परेशान हैं, जो विधर्भ में आत्मदाह कर रहे हैं..पर क्या करें इन लोगों को तो बस जंगल बढाने हैं ...चाहे ऐसे जंगलों की प्रजातियाँ इंसान को ही ख़तम क्यूँ न कर दें

Monday, April 13, 2009

क्या निराष हुआ जाय ?

एक अजीब सा डर हर तरफ फैल चुका है हर किसी को किसी न किसी का डर सता रहा है कोई किरायदार से तो कोई मकानमालिक से डरता है कोई अध्यापक से तो कोई छात्र से डरता है कोई पुलिस से तो कोई चोर से डरता है कोई असफलता से तो कोई सफल होने से डर रहा है आखिर ये डर कहाँ से आ गया और क्यूँ एक अमर बेल की लता की तरह से हर किसी पर लिपट सा गया है और लोगों की हसी छीन रहा है क्या लोगों को समझ नहीं आता की इससे उनकी जिन्दगी का सारा रस ख़तम हो रहा है या लोग जन के भी अनजाने बने हुए हैं ..डरे हुए हैं..पर आखिर क्यूँ .. क्यूँ नहीं वो इस डर को उखर फेकते हैं क्यूँ नहीं वो फिर से एक दुसरे के और समीप आ बात चीत कर हर उलझन को सुलझा लेते हैं क्या हुआ है लोगों को ...

Thursday, April 2, 2009

क्या कोई रोक पायेगा ?

बहुत दुख होता है अपनी असहयाता देख कर, कया करे हिन्दी मे ताइप जो नही कर पाते हे, और विदम्बना देकिये मन हिन्दी मे लिखने का ही है....सो अब अन्ग्रेजी मे लिख कर हिन्दी मै अनुवाद कराते है ..कमप्युतर सै.....लगता है कि आने वाले समय मे हिन्दी ऐसे ही हिन्ग्लिश मे परिवर्तित हो जायेगी...भगवान न करे ऐसा हो ..पर हुआ तो क्या कोइ रोक पायेगा ???????