गणेश चतुर्थी : होली और दिवाली एक साथ .
सुबह का समय था ..करीब सात बजे होंगे की ऐसा लगा की कोई दरवाज़े पैर ख़त कहता रहा है . जो उठ कर देखा तो छोटे छोटे बचे चुट पुटिया पाटाकों से खेल रहे थे ..कुछ समय बीता और हम भी दिनचर्या में लग गए क्यूँ की छुट्टी थी इस लिए घर का काम कुछ जादा था और साफ़ सफाई भी करनी थी..इधर मन भूल ही गया था की आज त्योहार है की तभी बच्चों की एक टोली घर के दरवाज़े पैर आ कर शोर मचने लगी बहर निकले तो पता चला उन्हें चंदा चाहिए था ..दिया ..दिया ही नहीं हलकी उनके सात कब कैसे काम में लग गए पता ही नहीं चला कभी कुछ सामग्री लाना तो कभी बिजली के तर लगाना ..कब दोपहर से शाम हो गयी पतः इ नहीं चला ..और शाम के वक़्त तो क्या बातें जैसे पूरी बिल्डिंग जगमगा उठी ..साथ ही दृश कुछ ऐसा था मनो लोग होली दिवाली सब एक सात मन रहे हों..पहले लोगों ने खूब पटाके फोडे फिर क्कुह ही देर में रंग खेलने लगे ..अब रंग भी ऐसे वैसे नहीं भल्की पुरे जोर से पानी के साथ...कुछ ही देर में लोगों ने मटकियाँ लटका दी और फिर क्या छोटे छोटे बचों को बारी बारी मौका दिया जाने लगा मटकियाँ फोड़ने का ..पैर वो उनसे कहाँ फूटती ..जैसे ही कोई बचा वार करता एक बड़ा आदमी मटकी को डोर से ऊपर खींच लेता ..बाद में कोई बड़ा लड़का ही मटकी फोरता..जैसे ही मटकी फूटती उससे कुछ सिक्के गिरते और बचे उन्हें बटोरते ..वाह क्या बताएं पूरी होली दिवाली सब एक ही बार में आनंद हुआ
Saturday, September 12, 2009
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