Friday, January 18, 2013

सखी सैयां तोह खूब ही कामात हैं महंगाई डायन खाए जात है

सखी  सैयां  तोह  खूब  ही  कामात  हैं
महंगाई  डायन  खाए  जात है 
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बचपन से पढाई को लेकर एक शिकायत रही ... कि ये अध्यापक अच्छे से पढ़ाते  नहीं हैं .समस्या कुछ और भी गंभीर हो गयी जब इंजीनियरिंग में दाखिला  हुआ और अध्यापक, अध्यापक कम वरन वेष  भूषा से चपरासी जादा  नज़र आने लगे ..ना समय पर आना ..ऩा ठीक से पढाना ..जादा परेशान हुए और संकल्प लिया की जो भी हो  बनुगा तो एक अच्छा अध्यापक ..जो हर तरह से ..अपने तन मन धन से अपने विषय एवम विध्यार्थियों की प्रति समर्पित रहेगा ....हुआ भी वही ..नौकरी मिल गयी लेक्चरर बन गए।।बहुत खुश ..बस  लगता की पैसे थोड़े कम मिलते हैं ... बस इतनी चाह थी की पगार बस 2 हज्जार और बढ़ जाये तो महीने के पुरे 10 तो हो जायेंगे ..फिर तो जो चाहेंगे वो करेंगे ..जहाँ जी करेगा वहां खाएंगे ..जो मन आएगा वो पीयेंगे ...पर दिवास्वप्न कभी कहाँ सच हुए हैं ...वक़्त बदला और सिर्फ 6 महीने में ही एक मौका मिला जहाँ 2 हज्जार नहीं बल्कि दुगनी आय थी ...पर नौकरी सॉफ्टवेर इंजिनियर की थी ..सोचा पैसे तो खूब हैं ..यदि मिलें तो खूब ऐश रहेगी  वैसे भी इतने कम वेतन में गुजारा ठीक से चल नहीं रहा था ...सोचा चलो 2-4 साल कमा के ..कुछ पैसे होजायेंगे  फिर वापिस कहीं लेक्चरर लग जायेंगे  (एक और दिवास्वप्न )...

जो सॉफ्टवेर इंजिनियर बने पैसे तो आने लगे जादा पर जो भी चीज़  खाएं  या पहने वही बहुत महंगी ...अब चीज़ें भी तो बदल रही थी ...कभी पिज़्ज़ा तो कभी बर्गर ..कभी कॉन्टिनेंटल तो कभी चाइनीज़ ...कभी लेविस की तो कभी ली की जीन्स ..सब महंगा ..पैसे फिर कम पड़ने लगे ...महीने की आखिरी तारीख तक बैंक में कुछ न बचता ...अक्सर दोस्तों से ऊधार लेना पड़ता ..खैर यह सोच कर ही खुश रहते की कम से कम घर से पैसे तो नहीं मंगाते अपना खर्च खुद ही ऊठा लेते ...बहुत गर्व होता था ये सोच कर ...अब दोस्त भी येही हाल में थे और अब मासिक पगार नहीं बल्खी सालाना आय पैर बात होती ..सब कहते की यार यदि  MBA कर लिया जाये तो वेतन सही मिलने लगेगा बिना उसके कोई जीवन नहीं ..बस फिर क्या था ..भर दिए 2-3 फॉर्म और ले लिया
दाखिला ... एक ऐसी गलती जो बड़ी भारी पड़ी ...

MBA की पढाई में फिर वही नासूर दुबारा फ़नक उठा ..ये अध्यापक अच्छे से पढ़ाते  नहीं हैं।।कई तो लगता है बस इसलिए पढाते हैं क्यूँ वो  किसी और  नौकरी के लायक ही नहीं हैं ...ऊपर से पढाई ऐसी की पता ही न चले के रात हो रही है या दिन ..इतना अध्यन तो कभी सपने में भी नहीं सोचा था।।पैर करना पड़ता ..मेहनत से कभी नहीं हारे ...सोचा जो हुआ सो हुआ पैर अब जरुर से कहीं MBA  के अध्यापक बन ..अच्छे अध्यापकों की कमी को ख़तम करने में सहयोग देंगे ...पुरे जोर शोर से ऐलान कर दिया दोतों में ...दोस्तों ने समझाया न ये आसान है न ही  संभव वरन तुम 5 साल और पढो पीएचडी करो ..तभी बनसकोगे कहीं  MBA के ठीक टीचर ..वो गलत थे पर ..समझाने में कामयाब रहे ..और हमने फिर एक अच्छे पगार देने वाली नौकरी पकड़ ली ....नौकरी भी ऐसी की वें इतना देती की सॉफ्टवेर इंजिनियर में  मिलता उससे 4-5 गुना जादा ....
कुछ दिन तो खूब अच्छा लगा ..पैर समय से बलवान कौन।।।कुछ दिन बाद वही हाल ..महीने के आखिर तक बैंक अकाउंट में कुछ बचा नहीं रहता ...और ऐसा भी नहीं की रोज़ फाख्ता उड़ा  रहे हों ...क्या कहें ..बस येही समझ आता है कि ....सखी  सैयां  तोह  खूब  ही  कामात  हैं 
महंगाई  डायन  खाए  जात है