Friday, January 18, 2013

सखी सैयां तोह खूब ही कामात हैं महंगाई डायन खाए जात है

सखी  सैयां  तोह  खूब  ही  कामात  हैं
महंगाई  डायन  खाए  जात है 
..........


बचपन से पढाई को लेकर एक शिकायत रही ... कि ये अध्यापक अच्छे से पढ़ाते  नहीं हैं .समस्या कुछ और भी गंभीर हो गयी जब इंजीनियरिंग में दाखिला  हुआ और अध्यापक, अध्यापक कम वरन वेष  भूषा से चपरासी जादा  नज़र आने लगे ..ना समय पर आना ..ऩा ठीक से पढाना ..जादा परेशान हुए और संकल्प लिया की जो भी हो  बनुगा तो एक अच्छा अध्यापक ..जो हर तरह से ..अपने तन मन धन से अपने विषय एवम विध्यार्थियों की प्रति समर्पित रहेगा ....हुआ भी वही ..नौकरी मिल गयी लेक्चरर बन गए।।बहुत खुश ..बस  लगता की पैसे थोड़े कम मिलते हैं ... बस इतनी चाह थी की पगार बस 2 हज्जार और बढ़ जाये तो महीने के पुरे 10 तो हो जायेंगे ..फिर तो जो चाहेंगे वो करेंगे ..जहाँ जी करेगा वहां खाएंगे ..जो मन आएगा वो पीयेंगे ...पर दिवास्वप्न कभी कहाँ सच हुए हैं ...वक़्त बदला और सिर्फ 6 महीने में ही एक मौका मिला जहाँ 2 हज्जार नहीं बल्कि दुगनी आय थी ...पर नौकरी सॉफ्टवेर इंजिनियर की थी ..सोचा पैसे तो खूब हैं ..यदि मिलें तो खूब ऐश रहेगी  वैसे भी इतने कम वेतन में गुजारा ठीक से चल नहीं रहा था ...सोचा चलो 2-4 साल कमा के ..कुछ पैसे होजायेंगे  फिर वापिस कहीं लेक्चरर लग जायेंगे  (एक और दिवास्वप्न )...

जो सॉफ्टवेर इंजिनियर बने पैसे तो आने लगे जादा पर जो भी चीज़  खाएं  या पहने वही बहुत महंगी ...अब चीज़ें भी तो बदल रही थी ...कभी पिज़्ज़ा तो कभी बर्गर ..कभी कॉन्टिनेंटल तो कभी चाइनीज़ ...कभी लेविस की तो कभी ली की जीन्स ..सब महंगा ..पैसे फिर कम पड़ने लगे ...महीने की आखिरी तारीख तक बैंक में कुछ न बचता ...अक्सर दोस्तों से ऊधार लेना पड़ता ..खैर यह सोच कर ही खुश रहते की कम से कम घर से पैसे तो नहीं मंगाते अपना खर्च खुद ही ऊठा लेते ...बहुत गर्व होता था ये सोच कर ...अब दोस्त भी येही हाल में थे और अब मासिक पगार नहीं बल्खी सालाना आय पैर बात होती ..सब कहते की यार यदि  MBA कर लिया जाये तो वेतन सही मिलने लगेगा बिना उसके कोई जीवन नहीं ..बस फिर क्या था ..भर दिए 2-3 फॉर्म और ले लिया
दाखिला ... एक ऐसी गलती जो बड़ी भारी पड़ी ...

MBA की पढाई में फिर वही नासूर दुबारा फ़नक उठा ..ये अध्यापक अच्छे से पढ़ाते  नहीं हैं।।कई तो लगता है बस इसलिए पढाते हैं क्यूँ वो  किसी और  नौकरी के लायक ही नहीं हैं ...ऊपर से पढाई ऐसी की पता ही न चले के रात हो रही है या दिन ..इतना अध्यन तो कभी सपने में भी नहीं सोचा था।।पैर करना पड़ता ..मेहनत से कभी नहीं हारे ...सोचा जो हुआ सो हुआ पैर अब जरुर से कहीं MBA  के अध्यापक बन ..अच्छे अध्यापकों की कमी को ख़तम करने में सहयोग देंगे ...पुरे जोर शोर से ऐलान कर दिया दोतों में ...दोस्तों ने समझाया न ये आसान है न ही  संभव वरन तुम 5 साल और पढो पीएचडी करो ..तभी बनसकोगे कहीं  MBA के ठीक टीचर ..वो गलत थे पर ..समझाने में कामयाब रहे ..और हमने फिर एक अच्छे पगार देने वाली नौकरी पकड़ ली ....नौकरी भी ऐसी की वें इतना देती की सॉफ्टवेर इंजिनियर में  मिलता उससे 4-5 गुना जादा ....
कुछ दिन तो खूब अच्छा लगा ..पैर समय से बलवान कौन।।।कुछ दिन बाद वही हाल ..महीने के आखिर तक बैंक अकाउंट में कुछ बचा नहीं रहता ...और ऐसा भी नहीं की रोज़ फाख्ता उड़ा  रहे हों ...क्या कहें ..बस येही समझ आता है कि ....सखी  सैयां  तोह  खूब  ही  कामात  हैं 
महंगाई  डायन  खाए  जात है

Sunday, May 2, 2010

रेखा

रेखा कि उम्र ८ साल होगी. रेखा कि दुनिया बहुत सीमित है . पर रेखा बहुत तेज़ तत्पर और खुश है
वो ये नहीं जानती कि गरीबी रेखा क्या है वो तो ये तक नहीं जानती कि वो किस दिन कब खाना खाती है
उसे तो बस खेलने कूदने और खुश रहने कि आदत है ..कितनी अच्छी है ये ..अभी दुनिया कि उन सब बुरी परछाईयों से दूर है जो इंसान को इंसान से दूर करती हैं  ..

दिन के १० बजे होंगे और में अपने पुस्तैनी घर या कहिये फ़ार्महाउस पहुंचा ..ये बनारस के पास एक गाँव है..यहाँ पहुँचते ही रेखा से मुलाकात हुई ..रेखा हमारे हरवाह कि नातिन है.. उसे देख के ऐसा लगा कि उससे खुस इंसान इस दुनिया में और कोई नहीं है ..तुरंत फूर्ती से अपनी नानी के साथ घर साफ़ करने में लग गयी..जहाँ हम अपने काम काज में लग गए वहां पास में आ कर वो कुछ खेलती रहती और अपने संगी साथियों को बताती कि मुन्सी जी आयें हैं ..हमारे मालिक हैं ...सुन के अजीब लगता ...पर क्या करें ये सिलसिला हमारे दादाजी के ज़माने से चला आ रहा है..उनकी जमींदारी थी ..और वो वकील भी थे ..तो गाँव भर उन्हें मुन्सी जी ही कहता ..और अब हमे भी ..हिसाब लगा कर देखा तो इस साल खेत से पैदावार पिछले साल से बहुत अच्छी हुई थी..और मजे कि बात ये थी कि गाँव के बाकि सभी खेतों से जादा हमारे खेत से गल्ला आ रहा था..हम लोग अब जादातर खेत किराये पर खेती के लिए देते थे और बस थोरा सा हिस्सा हरवाह को दे देते थे..जो आधिया पर फसल लगाता था ..

इधर हम काम निपटाते जा रहे थे..उधर लोग मिलने जुलने आते रहते..इन सब के बीच रेखा कि उत्सुकता तत्परता कम न पड़ती..कभी किसी के लिए मिठाई  पानी लाना तो कभी चाय बनाना..और हर बार पिछली बार से जादा खुस..शाम जब रेखा से बात हुई..तो दंग रह गए ..बच्ची हमे बचा समझ ..गाँव की राजनीती समझा रही थी..कोन कैसा है.किसकी भैंस अच्छी है ..और किसका क्या किस्सा है..सब पढ़ा दिया उसने..येही नहीं..ये जताने के लिए कि वो जादा तेज है..एक पतली  सी  दिवार जिस पर एक पैर से खड़ा होनो भी मुश्किल था ..उस पर दौड़ के पार  करने का मुकाबला कर दिया..हमने हर न मानी ..पर दौड़ के पूरा पार न कर पाए..बस फिर क्या था ..उसने झट से दौड़ कर दीवार पार करी...खूब हसी..और सबके पास जा जाकर ऐलान कर दिया ..कि उसने आज मुंशी जी को हरा दिया है...हारे तो थे ही हम...पर काफी मनन करने पर विवश कर दिया उस छोटी से लड़की ने  ...आखिर इंसान जैसे जैसे बड़ा होता है..खुशियाँ कहीं दूर चली जाती हैं ..और परेशां रहने लगता हाई ..आखिर क्यूँ ...क्या बस इसलिए कि वो मुन्सी जी के साथ दौड़ का मुकाबला नहीं कर सकता ?

Saturday, February 20, 2010

सब ठाठ धरा रह जायेगा

एक ये वक़्त है ..और एक वो वक़्त था जब मैंने IT की दुनिया में अपना पहला कदम रखा था..
वो वक़्त था जब हम फाकता उड़ाया करते थे ...
भाई जनाब को इनफ़ोसिस में नौकरी मिली थी 
सब कुछ था पर पहले दिन से ही एक खुमारी थी बस किसी तरह वक़्त गुजरे और जल्दी से MBA कर लें 
हुआ भी येही ..सब छोर MBA करने चल दिए ..पर क्या पता था की सच में सब छूट जायेगा 

पहला दिन और ये तक नहीं पता था की बंगलोर और मैसूर काफी दूर दूर  हैं
..कुछ ही दिन पहले जब जैसे ही ये पता चला की मैसूर जाना है जनाब जल्दी से जा के ट्रेन की टिकेट कटा लाये
और होशियार इतने की पूछो मत .. न किसी की सुननी न किसी से सलाह लेना बस जो मन में आया वही कर दिया
घरवालों ने बहुत कहा बेटा किसी से पूछ लो ..बहुत दूर है ..कोई और संगी साथी हो तो साथ चले जाओ...इतनी दूर जाना है हवाई जहाज से ही जाओ ..पर  अपने आगे किसी की हमने कभी सुनी कहाँ ..और वैसे भी सारे दोस्त यही कह रहे थे -की मत जा ये IT की दुनिया तेरी लिए नहीं है ..कुछ अपना धंधा करो ...या बस फिजीक्स पढो और वैज्ञानिक बनो   ..कोई अपनी कम्पनी खोलो ...या MBA करो और कर लो दुनिया मुट्ठी में ..पर यहाँ तो प्लान पूरी मस्ती का था..अपने आगे किसी की सुनी कहाँ ...
जैसे ही ख्याल आता इतना लम्बा ट्रेन का सफ़र... सोच के ही मंद मंद मुस्कान आ जाती थी ..हर स्टेशन पर उतरना चाय की चुस्कियां लेना ..इधर उधर जायेजा लेना और फिर चलती गाडी में दौड़ के चढ़ना  ..इस सब में जो मजे थे वो और कहाँ ...
दिन भर का प्लान तो पक्का था ..ट्रेन के बहार जो दिख जाये देखना था ..स्टेशन पर उतर के पानी, चाय, समोसे तो खाने ही थे..पर रात का क्या करेंगे ..खूब सोचा फिर जब कुछ और समझ नहीं आया तो वही पुराना शतरंज , बांसुरी और एक किताब उठा ली...मजे तो पूरे करने ही थे चाहे कुछ भी हो ..पर क्या पता था की ये मस्ती इस बार इतनी सस्ती नहीं होने वाले थी..
एक रात गुजरी ..आनंद तो आ रहा था ...पर  दुसरे दिन की शाम तक पूरे  बदन में ऐठन सी होगई थी ..और अब हर चीज़ मानो जैसे रंग बदल रही थी ...पहली बार ऐसा लग रहा था की .अपनी सारी ताक़त, हैसियत  या कहो अपना टशन कम हो रहा है ..
लोग अब हिंदी में नहीं अंग्रेगी में भी नहीं पर किसी और भाषा जिसका ज्ञान हमे बिलकुल ही नहीं था उस में बात करने लगे थे
खेर किसी तरह सफ़र तो बीता और हम बंगलोर पहुँच गए ..फिर वहां से मैसूर की बस पकड़ी ..और बस भी नए डिजाईन की नाम तो सुना ही था दर्शन भी करलिये ये प्रचलित वोल्वो थी ..जो न जानते हों उनके लिए AC बस ..सोचा था की ३०- ४० किलो मीटर दूर होगा थोरी देर में ही पहुँच जायेंगे पर क्या पता था पूरे  ५ घंटे लग जायेंगे ..मजे की बात सोचा था खाना मैसूर पहुँच के ही खायेंगे ..और पूरे  रास्ते कुछ अच्छा खाने को मिल नहीं रहा था ..जैसे तैसे पहुंचे तो रात हो गयी थी भूक के मारे बुरा हाल था ..करीब ८ बज रहे थे अब समझ नहीं आ रहा था की इतनी रात कंपनी जायें या कहीं किसी धरमशाला में रात गुजारें..कुछ बुद्धि काम नहीं कर रही थी ..तभी ध्यान आया ..घरवालों ने कहा था की बेटा जब तुम्हारी बुद्धि काम न करे तो घर फ़ोन करना ...पर फ़ोन कैसे करें ..फ़ोन की बैटरी  तो कब की ख़तम हो चली थी ..इधर उधर देखा तो एक STD बूथ दिखाई दिया ..गए वहां ..फ़ोन लगाया ..फ़ोन उठाते ही घर वाले शुरू हो गए ..वही डांट फटकार ..फ़ोन क्यूँ नहीं किया ..कब पहुंचे ..कैसे हो ..अब क्या बताएं ..अब घरवालों को क्या बताते की क्या हाल हैं ..कितनी भूक है ....और बाकि पूरी मस्ती चल रही है ...कहा  ठीक है  सब ..थोड़ी थकान है ..समझ नहीं आ रहा क्या करें ..उनने कहा जैसा ठीक लगे कर लो....एक बार कम्पनी फ़ोन कर बता दो की पहुँच गए हो ...बाकि तुम समझदार हो ....फिर क्या था तुरंत कंपनी HR को फ़ोन लगाया ..और उनके कहने पर ..PRE PAID ऑटो पकर चल दिए गंतव्य को ...
कंपनी पहुंचे तो माहोल मस्त था ..मार तमाम लड़के लडकियां बहार घूम रहे थे ...थोरी नज़र बढाई और अंदर देखा तो एक बिल्डिंग दिखाई दी ..बड़ी थी ..जो अब तक हमने देखा था  जैसे PT EDUCATION , GRAPECITY उससे तो कहीं बड़ी ...फिर देखा दूर अंत अंदर तक कुछ और नज़र ही नहीं आ रहा था..पर गेट पर हमे अपने..या कहो अपने जैसे तो नहीं पर लालटेन टाइप २-३ और लड़के दिखे जो सामान ले खड़े थे ..हमने सोचा क्या मुर्ख हैं सामान खुद कौन ले जायेगा..चोकीदार को पटा के ऑटो पूरा अंदर तक ले जायेंगे....पर ये चोकीदार कुछ सुनने कहने से पहले ही ..ऑटो वाले को डांटने लगा  ..हमे लगा जैसे कोई भारी गलती हो गयी है ...चुप चाप रिसेप्सन पर काल लैटर ले पहुँच गए ..उनने एक बड़ी सी लिस्ट थमाई और कहा सर आप का नाम कहाँ है. ..बहुत ढूंढेने के बाद नाम मिल ही गया ..तुरंत साइन  किये ..और कहा की ये गेस्ट हाउस तक ऑटो ले जाने दो ..सामान बहुत भारी है ..तो जवाब मिला -"सर आप ऑटो जाने दो ..अभी गाडी आएगी और आप उस में जाना ..अभी आपका सामान भी चेक होना है ..ऑटो वाले को जाने दो " कुछ अपने पे गर्व सा हुआ ..."गाडी आएगी आप उसमें ही जाना " जैसे शब्द..काश ये रिकॉर्ड कर के घर वालों को सुना पाता..तो कम से कम वो सारी बातें जिसमें हमारा जिक्र आलसी, कामचोर और निकम्मा हुआ था आज झूठ साबित हो जाती ..पर कहाँ.. इतना चैन इतनी आसानी से कहाँ मिलता है ...ख़ैर ऑटो वाले को पैसे दिए ..उसने भी जैसे चेहरे की रौनक भांप ली थी ..५० रुपैये और मांगने लगा..२० दिए.. कहा ऐश करो..वो मुह बना के चल दिया ..और इधर हम बी गाडी का इंतज़ार करने लगे...कुछ समय बीता और एक जीप आती दिखी ..फिर क्या न इधर देखा न उधर जल्दी से सामान उठा कर ..बाकी  खड़े लड़कों को जाता दिया की लाइन में पहले हम हैं..वो भी २-३ स्थान पैर आ खड़े हुए ..पर अब सारी टशन जैसे ख़तम सी होगई थी..यहाँ लोग हिंदी कम अंग्रेगी जादा समझते थे..यहाँ सडकें अपनी नहीं थी ..की मौज से कैसे ही चलें ..सब घमंड कम हो रहा था ..अब राजा नहीं रंक होने जा रहे थे .जीप आ के रुकी तो बहुत अच्छा लगा पर .तभी चोकीदार ने कहा  "सर ये आप के लिए नहीं है "..सारी मेहनत बेकार ..कुछ ऐसे जताया की हाँ हम जानते हैं ..पर फिर सोचा अगर जीप हमारे लिए नही फिर हम जायेंगे कैसे..अभी तो इसने कहा था की गाडी आएगी ..आखिर माजरा है क्या ...ये सोच इधर उधर नज़रें फिरा ही रहे थे की एक गार्ड आकर सामान उठाने  लगा ..उठा के आगे ले गया ..फिर आवाज़ आई ..सर ओपन ..ऐसा लगा जैसे किसी ने बेइअज़्ज़ति कर दी हो..माखौल उड़ाया हो ..अनसुना कर के घूर दिया ...जैसे की उसने कुछ गलत बोला हो..लेकिन उसने भी अपनी नौकरी करनी थी ..फिर बोला ..सर ये चेक करना है...फिर क्या करते गए और खोला ब्रीफकेस . उसने सब सामान टटोल के चेक किया और कहा.. सर पासपोर्ट दिखाइए ..दिखाया ..इस सबमें लगे थे की उसने कहा सर आप अंदर आ जाइये..आप की गाडी खड़ी है ..देखा तो हैरान ही रह गए ..अब तक बस TV में ही GOLF कार्ट देखी थी..और आज मौका मिला था बैठने का ..जैसे भगवान् ने सुन ली हो ..कितनी बार तमन्ना हुई थी की GOLFER नहीं तो बस CADDY ही बन जाते किसी तरह से .और आज..किसी ने ठीक ही कहा था भगवान् के घर में देर है  अंधेर नहीं...आज GOLF CART पे सैर हो ही गयी  ..बहुत ही आनंद आ रहा था GOLF कार्ट पर बैठ के शैर करने का ..लग रहा था जैसे जिंदगी में सब मिलगया हो ..पर कुछ समय..बाद हैरानी और भी बढ़ गयी ..एक के बाद एक ईमारत ..और एक से बढ़कर एक सुन्दर ..ये कहाँ आ गए थे ..हम ..जन्नत फीकी होगी इससे .. .विश्वास ही नहीं हो रहा था ...एक ईमारत तो पूरी गोल थी..TV में DISNEY लैंड की गोल बिल्डिंग देखी थी ये बिलकुल वैसी ही थी ...आगे जा के एक और रिसेप्सन पड़ा वहां नाम रजिस्टर  में दर्ज कर एक चाभी दे दी  गयी ..और गार्ड को समझा दिया गया की  कहाँ ले जाना है ...मजा तो बहुत आ रहा था पर सब अजीब सा भी लग रहा था ...तभी एक तख्ती पर एक लिस्ट दिखी ..जिसमें साथ ज्वाइन करने वालों के नाम थे..पढने लगे तो बस पढ़ते ही रह गए..एक-दो नहीं पूरे ५ अभिषेक मेरे नाम के साथ थे...पूरे ७५० नाम थे और आधे नहीं तो कम से कम एक तिहाई लडकियां तो थी ...लिस्ट पढ़ते ही कुछ अजीब सा लगने लगा. ..सब दोस्त यार जिनोंहे माना किया था IT में न जाने की सलाह दी थी ...याद आने लगे थे .....
ये समझ तो आ रहा था की इतने लोग गेस्ट हाउस में तो नहीं रुके होंगे..फिर आकिर सब हैं कहाँ ..
गाडी फिर चल दी और फिर एक के बाद एक  इमारतें..पुछा तो पाता चला यहीं रहना है अब ३-४ महीने ..अच्छा लगा अजीब भी ..हॉस्टल पहुंचे ...सामान भारी था..पर किसी तरह ३ मंजिल तक ले गए..दरवाज़ा खोला..स्विच ऑन किये....बिजली नदारद...गुस्से से तमतमा उठे..जोर जोर से गार्ड गार्ड  चिल्लाया....वो दौड़ता हुआ आया और समझ गया कुछ गड़बड़ है..मैंने कहा... ये पॉवर नहीं है यहाँ..वो सकपका के बोला... सर वेट करिए हाउस कीपिंग मेकानिक  ५ मिनट में आ जायेगा....सुन के गुस्सा ठंडा हुआ..दुबारा जा के मेन स्विच चेक किया.. अगर फुज उड़ गया हो तो खुद ही ठीक कर लेते पर यहाँ तो कुछ और ही चक्कर था ..मेकनिक ५ मिनट से कम में ही आ गया ..और बोला ... सर क्या हुआ ..हमने कहा तुम देखो .स्विच ऑन है पैर लाइट नहीं जल रही ...वो हस्ते हुए बोला ...अरे सर आप ने स्विच में चाभी नहीं लगायी है ...शर्म सी आई ..ऐसा न था की ऐसे स्विच देखे ही नहीं थे ..पर हाँ कभी खुद चाभी भी नहीं लगायी थी ...अब समझ में आया की ये दुनिया कुछ हाई फाई हाई थी ..चाभी का छला फ़साने से स्विच ऑन होता था ...लाइट जली तो हैरानी और भी बढ़ गयी..रूम में फ़ोन, टीवी,२ बेड, ४ कुर्सियां ,३ मेंज, २ लोक्कर, ३-४ अलमारियां , खिडकियों  पे आलीशान परदे , स्प्लिट AC ,एक इलेक्ट्रिक टी कैटल ,एक आएरून  बॉक्स और शानदार अटेच्ड बाथरूम था ...वाह क्या बात थी ..उफ़ जो सोचा उससे कहीं जादा था ..अब समय आ गया था की दुबारा घर फ़ोन करें ..और सब बकाहन कर डालें , बता दें  की क्या पाया है ...किया ..और खुश हुए ...
वहां बस ऐश करनी थी ..करी ..पर आप तो जानते ही हैं कि... जादा घी हज़म कहाँ होता है  ..फ़िज़ूल में MBA का फितूर .. सब छोर करना ही था...  तो वो भी किया..आखिर अपने आगे हमने किसी कि कभी सुनी कहाँ ....
बातें और भी हैं बताने को ..असली मस्ती तो अगले दिन से शुरू हुई थी ..पर बाद में कभी लिखेंगे ....
पर समय तो बीत ही जाता है  ..बीत रहा है ...पर वो ऐश अब कहाँ ...

Saturday, September 12, 2009

गणेश चतुर्थी : होली और दिवाली एक साथ

गणेश चतुर्थी : होली और दिवाली एक साथ .
सुबह का समय था ..करीब सात बजे होंगे की ऐसा लगा की कोई दरवाज़े पैर ख़त कहता रहा है . जो उठ कर देखा तो छोटे छोटे बचे चुट पुटिया पाटाकों से खेल रहे थे ..कुछ समय बीता और हम भी दिनचर्या में लग गए क्यूँ की छुट्टी थी इस लिए घर का काम कुछ जादा था और साफ़ सफाई भी करनी थी..इधर मन भूल ही गया था की आज त्योहार है की तभी बच्चों की एक टोली घर के दरवाज़े पैर आ कर शोर मचने लगी बहर निकले तो पता चला उन्हें चंदा चाहिए था ..दिया ..दिया ही नहीं हलकी उनके सात कब कैसे काम में लग गए पता ही नहीं चला कभी कुछ सामग्री लाना तो कभी बिजली के तर लगाना ..कब दोपहर से शाम हो गयी पतः इ नहीं चला ..और शाम के वक़्त तो क्या बातें जैसे पूरी बिल्डिंग जगमगा उठी ..साथ ही दृश कुछ ऐसा था मनो लोग होली दिवाली सब एक सात मन रहे हों..पहले लोगों ने खूब पटाके फोडे फिर क्कुह ही देर में रंग खेलने लगे ..अब रंग भी ऐसे वैसे नहीं भल्की पुरे जोर से पानी के साथ...कुछ ही देर में लोगों ने मटकियाँ लटका दी और फिर क्या छोटे छोटे बचों को बारी बारी मौका दिया जाने लगा मटकियाँ फोड़ने का ..पैर वो उनसे कहाँ फूटती ..जैसे ही कोई बचा वार करता एक बड़ा आदमी मटकी को डोर से ऊपर खींच लेता ..बाद में कोई बड़ा लड़का ही मटकी फोरता..जैसे ही मटकी फूटती उससे कुछ सिक्के गिरते और बचे उन्हें बटोरते ..वाह क्या बताएं पूरी होली दिवाली सब एक ही बार में आनंद हुआ

Thursday, July 2, 2009

ये ईंट पत्थरों के जंगल

मुंबई, दिल्ली, बंगलोर, पुणे और हैदराबाद में एक समान्ता है. इन जगहों पर घोर घने जंगल हैं पर ये कोई आम जंगल नहीं हैं ये हैं ईंट पत्थरों के जंगल जहाँ तक नज़र जाती है दिखाई पड़ती हैं तो बस बड़ी बड़ी बहुमंज़ली इमारतें..अन्य प्रसिद्ध प्रजातियाँ जैसे मल्टीप्लेक्स, मॉल,होटल इत्य आदि , खैर गम इस बात का नहीं है की ये जंगल फलते ही जा रहे हैं..और अब इनकी चपेट में छोटे सहर भी आ चुके हैं वरन इस बात का है की सर्कार..उद्योगपति और अन्य लोग जो इन जंगलों को बढाने में लगे हैं वह थोरा बस थोरा सा ध्यान व् धन उन पर भी लगा देते जो भुकमरी से परेशान हैं, जो विधर्भ में आत्मदाह कर रहे हैं..पर क्या करें इन लोगों को तो बस जंगल बढाने हैं ...चाहे ऐसे जंगलों की प्रजातियाँ इंसान को ही ख़तम क्यूँ न कर दें

Monday, April 13, 2009

क्या निराष हुआ जाय ?

एक अजीब सा डर हर तरफ फैल चुका है हर किसी को किसी न किसी का डर सता रहा है कोई किरायदार से तो कोई मकानमालिक से डरता है कोई अध्यापक से तो कोई छात्र से डरता है कोई पुलिस से तो कोई चोर से डरता है कोई असफलता से तो कोई सफल होने से डर रहा है आखिर ये डर कहाँ से आ गया और क्यूँ एक अमर बेल की लता की तरह से हर किसी पर लिपट सा गया है और लोगों की हसी छीन रहा है क्या लोगों को समझ नहीं आता की इससे उनकी जिन्दगी का सारा रस ख़तम हो रहा है या लोग जन के भी अनजाने बने हुए हैं ..डरे हुए हैं..पर आखिर क्यूँ .. क्यूँ नहीं वो इस डर को उखर फेकते हैं क्यूँ नहीं वो फिर से एक दुसरे के और समीप आ बात चीत कर हर उलझन को सुलझा लेते हैं क्या हुआ है लोगों को ...

Thursday, April 2, 2009

क्या कोई रोक पायेगा ?

बहुत दुख होता है अपनी असहयाता देख कर, कया करे हिन्दी मे ताइप जो नही कर पाते हे, और विदम्बना देकिये मन हिन्दी मे लिखने का ही है....सो अब अन्ग्रेजी मे लिख कर हिन्दी मै अनुवाद कराते है ..कमप्युतर सै.....लगता है कि आने वाले समय मे हिन्दी ऐसे ही हिन्ग्लिश मे परिवर्तित हो जायेगी...भगवान न करे ऐसा हो ..पर हुआ तो क्या कोइ रोक पायेगा ???????