वो वक़्त था जब हम फाकता उड़ाया करते थे ...
भाई जनाब को इनफ़ोसिस में नौकरी मिली थी
सब कुछ था पर पहले दिन से ही एक खुमारी थी बस किसी तरह वक़्त गुजरे और जल्दी से MBA कर लें
हुआ भी येही ..सब छोर MBA करने चल दिए ..पर क्या पता था की सच में सब छूट जायेगा
पहला दिन और ये तक नहीं पता था की बंगलोर और मैसूर काफी दूर दूर हैं
..कुछ ही दिन पहले जब जैसे ही ये पता चला की मैसूर जाना है जनाब जल्दी से जा के ट्रेन की टिकेट कटा लाये
और होशियार इतने की पूछो मत .. न किसी की सुननी न किसी से सलाह लेना बस जो मन में आया वही कर दिया
घरवालों ने बहुत कहा बेटा किसी से पूछ लो ..बहुत दूर है ..कोई और संगी साथी हो तो साथ चले जाओ...इतनी दूर जाना है हवाई जहाज से ही जाओ ..पर अपने आगे किसी की हमने कभी सुनी कहाँ ..और वैसे भी सारे दोस्त यही कह रहे थे -की मत जा ये IT की दुनिया तेरी लिए नहीं है ..कुछ अपना धंधा करो ...या बस फिजीक्स पढो और वैज्ञानिक बनो ..कोई अपनी कम्पनी खोलो ...या MBA करो और कर लो दुनिया मुट्ठी में ..पर यहाँ तो प्लान पूरी मस्ती का था..अपने आगे किसी की सुनी कहाँ ...
जैसे ही ख्याल आता इतना लम्बा ट्रेन का सफ़र... सोच के ही मंद मंद मुस्कान आ जाती थी ..हर स्टेशन पर उतरना चाय की चुस्कियां लेना ..इधर उधर जायेजा लेना और फिर चलती गाडी में दौड़ के चढ़ना ..इस सब में जो मजे थे वो और कहाँ ...
दिन भर का प्लान तो पक्का था ..ट्रेन के बहार जो दिख जाये देखना था ..स्टेशन पर उतर के पानी, चाय, समोसे तो खाने ही थे..पर रात का क्या करेंगे ..खूब सोचा फिर जब कुछ और समझ नहीं आया तो वही पुराना शतरंज , बांसुरी और एक किताब उठा ली...मजे तो पूरे करने ही थे चाहे कुछ भी हो ..पर क्या पता था की ये मस्ती इस बार इतनी सस्ती नहीं होने वाले थी..
एक रात गुजरी ..आनंद तो आ रहा था ...पर दुसरे दिन की शाम तक पूरे बदन में ऐठन सी होगई थी ..और अब हर चीज़ मानो जैसे रंग बदल रही थी ...पहली बार ऐसा लग रहा था की .अपनी सारी ताक़त, हैसियत या कहो अपना टशन कम हो रहा है ..
लोग अब हिंदी में नहीं अंग्रेगी में भी नहीं पर किसी और भाषा जिसका ज्ञान हमे बिलकुल ही नहीं था उस में बात करने लगे थे
खेर किसी तरह सफ़र तो बीता और हम बंगलोर पहुँच गए ..फिर वहां से मैसूर की बस पकड़ी ..और बस भी नए डिजाईन की नाम तो सुना ही था दर्शन भी करलिये ये प्रचलित वोल्वो थी ..जो न जानते हों उनके लिए AC बस ..सोचा था की ३०- ४० किलो मीटर दूर होगा थोरी देर में ही पहुँच जायेंगे पर क्या पता था पूरे ५ घंटे लग जायेंगे ..मजे की बात सोचा था खाना मैसूर पहुँच के ही खायेंगे ..और पूरे रास्ते कुछ अच्छा खाने को मिल नहीं रहा था ..जैसे तैसे पहुंचे तो रात हो गयी थी भूक के मारे बुरा हाल था ..करीब ८ बज रहे थे अब समझ नहीं आ रहा था की इतनी रात कंपनी जायें या कहीं किसी धरमशाला में रात गुजारें..कुछ बुद्धि काम नहीं कर रही थी ..तभी ध्यान आया ..घरवालों ने कहा था की बेटा जब तुम्हारी बुद्धि काम न करे तो घर फ़ोन करना ...पर फ़ोन कैसे करें ..फ़ोन की बैटरी तो कब की ख़तम हो चली थी ..इधर उधर देखा तो एक STD बूथ दिखाई दिया ..गए वहां ..फ़ोन लगाया ..फ़ोन उठाते ही घर वाले शुरू हो गए ..वही डांट फटकार ..फ़ोन क्यूँ नहीं किया ..कब पहुंचे ..कैसे हो ..अब क्या बताएं ..अब घरवालों को क्या बताते की क्या हाल हैं ..कितनी भूक है ....और बाकि पूरी मस्ती चल रही है ...कहा ठीक है सब ..थोड़ी थकान है ..समझ नहीं आ रहा क्या करें ..उनने कहा जैसा ठीक लगे कर लो....एक बार कम्पनी फ़ोन कर बता दो की पहुँच गए हो ...बाकि तुम समझदार हो ....फिर क्या था तुरंत कंपनी HR को फ़ोन लगाया ..और उनके कहने पर ..PRE PAID ऑटो पकर चल दिए गंतव्य को ...
कंपनी पहुंचे तो माहोल मस्त था ..मार तमाम लड़के लडकियां बहार घूम रहे थे ...थोरी नज़र बढाई और अंदर देखा तो एक बिल्डिंग दिखाई दी ..बड़ी थी ..जो अब तक हमने देखा था जैसे PT EDUCATION , GRAPECITY उससे तो कहीं बड़ी ...फिर देखा दूर अंत अंदर तक कुछ और नज़र ही नहीं आ रहा था..पर गेट पर हमे अपने..या कहो अपने जैसे तो नहीं पर लालटेन टाइप २-३ और लड़के दिखे जो सामान ले खड़े थे ..हमने सोचा क्या मुर्ख हैं सामान खुद कौन ले जायेगा..चोकीदार को पटा के ऑटो पूरा अंदर तक ले जायेंगे....पर ये चोकीदार कुछ सुनने कहने से पहले ही ..ऑटो वाले को डांटने लगा ..हमे लगा जैसे कोई भारी गलती हो गयी है ...चुप चाप रिसेप्सन पर काल लैटर ले पहुँच गए ..उनने एक बड़ी सी लिस्ट थमाई और कहा सर आप का नाम कहाँ है. ..बहुत ढूंढेने के बाद नाम मिल ही गया ..तुरंत साइन किये ..और कहा की ये गेस्ट हाउस तक ऑटो ले जाने दो ..सामान बहुत भारी है ..तो जवाब मिला -"सर आप ऑटो जाने दो ..अभी गाडी आएगी और आप उस में जाना ..अभी आपका सामान भी चेक होना है ..ऑटो वाले को जाने दो " कुछ अपने पे गर्व सा हुआ ..."गाडी आएगी आप उसमें ही जाना " जैसे शब्द..काश ये रिकॉर्ड कर के घर वालों को सुना पाता..तो कम से कम वो सारी बातें जिसमें हमारा जिक्र आलसी, कामचोर और निकम्मा हुआ था आज झूठ साबित हो जाती ..पर कहाँ.. इतना चैन इतनी आसानी से कहाँ मिलता है ...ख़ैर ऑटो वाले को पैसे दिए ..उसने भी जैसे चेहरे की रौनक भांप ली थी ..५० रुपैये और मांगने लगा..२० दिए.. कहा ऐश करो..वो मुह बना के चल दिया ..और इधर हम बी गाडी का इंतज़ार करने लगे...कुछ समय बीता और एक जीप आती दिखी ..फिर क्या न इधर देखा न उधर जल्दी से सामान उठा कर ..बाकी खड़े लड़कों को जाता दिया की लाइन में पहले हम हैं..वो भी २-३ स्थान पैर आ खड़े हुए ..पर अब सारी टशन जैसे ख़तम सी होगई थी..यहाँ लोग हिंदी कम अंग्रेगी जादा समझते थे..यहाँ सडकें अपनी नहीं थी ..की मौज से कैसे ही चलें ..सब घमंड कम हो रहा था ..अब राजा नहीं रंक होने जा रहे थे .जीप आ के रुकी तो बहुत अच्छा लगा पर .तभी चोकीदार ने कहा "सर ये आप के लिए नहीं है "..सारी मेहनत बेकार ..कुछ ऐसे जताया की हाँ हम जानते हैं ..पर फिर सोचा अगर जीप हमारे लिए नही फिर हम जायेंगे कैसे..अभी तो इसने कहा था की गाडी आएगी ..आखिर माजरा है क्या ...ये सोच इधर उधर नज़रें फिरा ही रहे थे की एक गार्ड आकर सामान उठाने लगा ..उठा के आगे ले गया ..फिर आवाज़ आई ..सर ओपन ..ऐसा लगा जैसे किसी ने बेइअज़्ज़ति कर दी हो..माखौल उड़ाया हो ..अनसुना कर के घूर दिया ...जैसे की उसने कुछ गलत बोला हो..लेकिन उसने भी अपनी नौकरी करनी थी ..फिर बोला ..सर ये चेक करना है...फिर क्या करते गए और खोला ब्रीफकेस . उसने सब सामान टटोल के चेक किया और कहा.. सर पासपोर्ट दिखाइए ..दिखाया ..इस सबमें लगे थे की उसने कहा सर आप अंदर आ जाइये..आप की गाडी खड़ी है ..देखा तो हैरान ही रह गए ..अब तक बस TV में ही GOLF कार्ट देखी थी..और आज मौका मिला था बैठने का ..जैसे भगवान् ने सुन ली हो ..कितनी बार तमन्ना हुई थी की GOLFER नहीं तो बस CADDY ही बन जाते किसी तरह से .और आज..किसी ने ठीक ही कहा था भगवान् के घर में देर है अंधेर नहीं...आज GOLF CART पे सैर हो ही गयी ..बहुत ही आनंद आ रहा था GOLF कार्ट पर बैठ के शैर करने का ..लग रहा था जैसे जिंदगी में सब मिलगया हो ..पर कुछ समय..बाद हैरानी और भी बढ़ गयी ..एक के बाद एक ईमारत ..और एक से बढ़कर एक सुन्दर ..ये कहाँ आ गए थे ..हम ..जन्नत फीकी होगी इससे .. .विश्वास ही नहीं हो रहा था ...एक ईमारत तो पूरी गोल थी..TV में DISNEY लैंड की गोल बिल्डिंग देखी थी ये बिलकुल वैसी ही थी ...आगे जा के एक और रिसेप्सन पड़ा वहां नाम रजिस्टर में दर्ज कर एक चाभी दे दी गयी ..और गार्ड को समझा दिया गया की कहाँ ले जाना है ...मजा तो बहुत आ रहा था पर सब अजीब सा भी लग रहा था ...तभी एक तख्ती पर एक लिस्ट दिखी ..जिसमें साथ ज्वाइन करने वालों के नाम थे..पढने लगे तो बस पढ़ते ही रह गए..एक-दो नहीं पूरे ५ अभिषेक मेरे नाम के साथ थे...पूरे ७५० नाम थे और आधे नहीं तो कम से कम एक तिहाई लडकियां तो थी ...लिस्ट पढ़ते ही कुछ अजीब सा लगने लगा. ..सब दोस्त यार जिनोंहे माना किया था IT में न जाने की सलाह दी थी ...याद आने लगे थे .....
ये समझ तो आ रहा था की इतने लोग गेस्ट हाउस में तो नहीं रुके होंगे..फिर आकिर सब हैं कहाँ ..
गाडी फिर चल दी और फिर एक के बाद एक इमारतें..पुछा तो पाता चला यहीं रहना है अब ३-४ महीने ..अच्छा लगा अजीब भी ..हॉस्टल पहुंचे ...सामान भारी था..पर किसी तरह ३ मंजिल तक ले गए..दरवाज़ा खोला..स्विच ऑन किये....बिजली नदारद...गुस्से से तमतमा उठे..जोर जोर से गार्ड गार्ड चिल्लाया....वो दौड़ता हुआ आया और समझ गया कुछ गड़बड़ है..मैंने कहा... ये पॉवर नहीं है यहाँ..वो सकपका के बोला... सर वेट करिए हाउस कीपिंग मेकानिक ५ मिनट में आ जायेगा....सुन के गुस्सा ठंडा हुआ..दुबारा जा के मेन स्विच चेक किया.. अगर फुज उड़ गया हो तो खुद ही ठीक कर लेते पर यहाँ तो कुछ और ही चक्कर था ..मेकनिक ५ मिनट से कम में ही आ गया ..और बोला ... सर क्या हुआ ..हमने कहा तुम देखो .स्विच ऑन है पैर लाइट नहीं जल रही ...वो हस्ते हुए बोला ...अरे सर आप ने स्विच में चाभी नहीं लगायी है ...शर्म सी आई ..ऐसा न था की ऐसे स्विच देखे ही नहीं थे ..पर हाँ कभी खुद चाभी भी नहीं लगायी थी ...अब समझ में आया की ये दुनिया कुछ हाई फाई हाई थी ..चाभी का छला फ़साने से स्विच ऑन होता था ...लाइट जली तो हैरानी और भी बढ़ गयी..रूम में फ़ोन, टीवी,२ बेड, ४ कुर्सियां ,३ मेंज, २ लोक्कर, ३-४ अलमारियां , खिडकियों पे आलीशान परदे , स्प्लिट AC ,एक इलेक्ट्रिक टी कैटल ,एक आएरून बॉक्स और शानदार अटेच्ड बाथरूम था ...वाह क्या बात थी ..उफ़ जो सोचा उससे कहीं जादा था ..अब समय आ गया था की दुबारा घर फ़ोन करें ..और सब बकाहन कर डालें , बता दें की क्या पाया है ...किया ..और खुश हुए ...
वहां बस ऐश करनी थी ..करी ..पर आप तो जानते ही हैं कि... जादा घी हज़म कहाँ होता है ..फ़िज़ूल में MBA का फितूर .. सब छोर करना ही था... तो वो भी किया..आखिर अपने आगे हमने किसी कि कभी सुनी कहाँ ....
बातें और भी हैं बताने को ..असली मस्ती तो अगले दिन से शुरू हुई थी ..पर बाद में कभी लिखेंगे ....
पर समय तो बीत ही जाता है ..बीत रहा है ...पर वो ऐश अब कहाँ ...
..कुछ ही दिन पहले जब जैसे ही ये पता चला की मैसूर जाना है जनाब जल्दी से जा के ट्रेन की टिकेट कटा लाये
और होशियार इतने की पूछो मत .. न किसी की सुननी न किसी से सलाह लेना बस जो मन में आया वही कर दिया
घरवालों ने बहुत कहा बेटा किसी से पूछ लो ..बहुत दूर है ..कोई और संगी साथी हो तो साथ चले जाओ...इतनी दूर जाना है हवाई जहाज से ही जाओ ..पर अपने आगे किसी की हमने कभी सुनी कहाँ ..और वैसे भी सारे दोस्त यही कह रहे थे -की मत जा ये IT की दुनिया तेरी लिए नहीं है ..कुछ अपना धंधा करो ...या बस फिजीक्स पढो और वैज्ञानिक बनो ..कोई अपनी कम्पनी खोलो ...या MBA करो और कर लो दुनिया मुट्ठी में ..पर यहाँ तो प्लान पूरी मस्ती का था..अपने आगे किसी की सुनी कहाँ ...
जैसे ही ख्याल आता इतना लम्बा ट्रेन का सफ़र... सोच के ही मंद मंद मुस्कान आ जाती थी ..हर स्टेशन पर उतरना चाय की चुस्कियां लेना ..इधर उधर जायेजा लेना और फिर चलती गाडी में दौड़ के चढ़ना ..इस सब में जो मजे थे वो और कहाँ ...
दिन भर का प्लान तो पक्का था ..ट्रेन के बहार जो दिख जाये देखना था ..स्टेशन पर उतर के पानी, चाय, समोसे तो खाने ही थे..पर रात का क्या करेंगे ..खूब सोचा फिर जब कुछ और समझ नहीं आया तो वही पुराना शतरंज , बांसुरी और एक किताब उठा ली...मजे तो पूरे करने ही थे चाहे कुछ भी हो ..पर क्या पता था की ये मस्ती इस बार इतनी सस्ती नहीं होने वाले थी..
एक रात गुजरी ..आनंद तो आ रहा था ...पर दुसरे दिन की शाम तक पूरे बदन में ऐठन सी होगई थी ..और अब हर चीज़ मानो जैसे रंग बदल रही थी ...पहली बार ऐसा लग रहा था की .अपनी सारी ताक़त, हैसियत या कहो अपना टशन कम हो रहा है ..
लोग अब हिंदी में नहीं अंग्रेगी में भी नहीं पर किसी और भाषा जिसका ज्ञान हमे बिलकुल ही नहीं था उस में बात करने लगे थे
खेर किसी तरह सफ़र तो बीता और हम बंगलोर पहुँच गए ..फिर वहां से मैसूर की बस पकड़ी ..और बस भी नए डिजाईन की नाम तो सुना ही था दर्शन भी करलिये ये प्रचलित वोल्वो थी ..जो न जानते हों उनके लिए AC बस ..सोचा था की ३०- ४० किलो मीटर दूर होगा थोरी देर में ही पहुँच जायेंगे पर क्या पता था पूरे ५ घंटे लग जायेंगे ..मजे की बात सोचा था खाना मैसूर पहुँच के ही खायेंगे ..और पूरे रास्ते कुछ अच्छा खाने को मिल नहीं रहा था ..जैसे तैसे पहुंचे तो रात हो गयी थी भूक के मारे बुरा हाल था ..करीब ८ बज रहे थे अब समझ नहीं आ रहा था की इतनी रात कंपनी जायें या कहीं किसी धरमशाला में रात गुजारें..कुछ बुद्धि काम नहीं कर रही थी ..तभी ध्यान आया ..घरवालों ने कहा था की बेटा जब तुम्हारी बुद्धि काम न करे तो घर फ़ोन करना ...पर फ़ोन कैसे करें ..फ़ोन की बैटरी तो कब की ख़तम हो चली थी ..इधर उधर देखा तो एक STD बूथ दिखाई दिया ..गए वहां ..फ़ोन लगाया ..फ़ोन उठाते ही घर वाले शुरू हो गए ..वही डांट फटकार ..फ़ोन क्यूँ नहीं किया ..कब पहुंचे ..कैसे हो ..अब क्या बताएं ..अब घरवालों को क्या बताते की क्या हाल हैं ..कितनी भूक है ....और बाकि पूरी मस्ती चल रही है ...कहा ठीक है सब ..थोड़ी थकान है ..समझ नहीं आ रहा क्या करें ..उनने कहा जैसा ठीक लगे कर लो....एक बार कम्पनी फ़ोन कर बता दो की पहुँच गए हो ...बाकि तुम समझदार हो ....फिर क्या था तुरंत कंपनी HR को फ़ोन लगाया ..और उनके कहने पर ..PRE PAID ऑटो पकर चल दिए गंतव्य को ...
कंपनी पहुंचे तो माहोल मस्त था ..मार तमाम लड़के लडकियां बहार घूम रहे थे ...थोरी नज़र बढाई और अंदर देखा तो एक बिल्डिंग दिखाई दी ..बड़ी थी ..जो अब तक हमने देखा था जैसे PT EDUCATION , GRAPECITY उससे तो कहीं बड़ी ...फिर देखा दूर अंत अंदर तक कुछ और नज़र ही नहीं आ रहा था..पर गेट पर हमे अपने..या कहो अपने जैसे तो नहीं पर लालटेन टाइप २-३ और लड़के दिखे जो सामान ले खड़े थे ..हमने सोचा क्या मुर्ख हैं सामान खुद कौन ले जायेगा..चोकीदार को पटा के ऑटो पूरा अंदर तक ले जायेंगे....पर ये चोकीदार कुछ सुनने कहने से पहले ही ..ऑटो वाले को डांटने लगा ..हमे लगा जैसे कोई भारी गलती हो गयी है ...चुप चाप रिसेप्सन पर काल लैटर ले पहुँच गए ..उनने एक बड़ी सी लिस्ट थमाई और कहा सर आप का नाम कहाँ है. ..बहुत ढूंढेने के बाद नाम मिल ही गया ..तुरंत साइन किये ..और कहा की ये गेस्ट हाउस तक ऑटो ले जाने दो ..सामान बहुत भारी है ..तो जवाब मिला -"सर आप ऑटो जाने दो ..अभी गाडी आएगी और आप उस में जाना ..अभी आपका सामान भी चेक होना है ..ऑटो वाले को जाने दो " कुछ अपने पे गर्व सा हुआ ..."गाडी आएगी आप उसमें ही जाना " जैसे शब्द..काश ये रिकॉर्ड कर के घर वालों को सुना पाता..तो कम से कम वो सारी बातें जिसमें हमारा जिक्र आलसी, कामचोर और निकम्मा हुआ था आज झूठ साबित हो जाती ..पर कहाँ.. इतना चैन इतनी आसानी से कहाँ मिलता है ...ख़ैर ऑटो वाले को पैसे दिए ..उसने भी जैसे चेहरे की रौनक भांप ली थी ..५० रुपैये और मांगने लगा..२० दिए.. कहा ऐश करो..वो मुह बना के चल दिया ..और इधर हम बी गाडी का इंतज़ार करने लगे...कुछ समय बीता और एक जीप आती दिखी ..फिर क्या न इधर देखा न उधर जल्दी से सामान उठा कर ..बाकी खड़े लड़कों को जाता दिया की लाइन में पहले हम हैं..वो भी २-३ स्थान पैर आ खड़े हुए ..पर अब सारी टशन जैसे ख़तम सी होगई थी..यहाँ लोग हिंदी कम अंग्रेगी जादा समझते थे..यहाँ सडकें अपनी नहीं थी ..की मौज से कैसे ही चलें ..सब घमंड कम हो रहा था ..अब राजा नहीं रंक होने जा रहे थे .जीप आ के रुकी तो बहुत अच्छा लगा पर .तभी चोकीदार ने कहा "सर ये आप के लिए नहीं है "..सारी मेहनत बेकार ..कुछ ऐसे जताया की हाँ हम जानते हैं ..पर फिर सोचा अगर जीप हमारे लिए नही फिर हम जायेंगे कैसे..अभी तो इसने कहा था की गाडी आएगी ..आखिर माजरा है क्या ...ये सोच इधर उधर नज़रें फिरा ही रहे थे की एक गार्ड आकर सामान उठाने लगा ..उठा के आगे ले गया ..फिर आवाज़ आई ..सर ओपन ..ऐसा लगा जैसे किसी ने बेइअज़्ज़ति कर दी हो..माखौल उड़ाया हो ..अनसुना कर के घूर दिया ...जैसे की उसने कुछ गलत बोला हो..लेकिन उसने भी अपनी नौकरी करनी थी ..फिर बोला ..सर ये चेक करना है...फिर क्या करते गए और खोला ब्रीफकेस . उसने सब सामान टटोल के चेक किया और कहा.. सर पासपोर्ट दिखाइए ..दिखाया ..इस सबमें लगे थे की उसने कहा सर आप अंदर आ जाइये..आप की गाडी खड़ी है ..देखा तो हैरान ही रह गए ..अब तक बस TV में ही GOLF कार्ट देखी थी..और आज मौका मिला था बैठने का ..जैसे भगवान् ने सुन ली हो ..कितनी बार तमन्ना हुई थी की GOLFER नहीं तो बस CADDY ही बन जाते किसी तरह से .और आज..किसी ने ठीक ही कहा था भगवान् के घर में देर है अंधेर नहीं...आज GOLF CART पे सैर हो ही गयी ..बहुत ही आनंद आ रहा था GOLF कार्ट पर बैठ के शैर करने का ..लग रहा था जैसे जिंदगी में सब मिलगया हो ..पर कुछ समय..बाद हैरानी और भी बढ़ गयी ..एक के बाद एक ईमारत ..और एक से बढ़कर एक सुन्दर ..ये कहाँ आ गए थे ..हम ..जन्नत फीकी होगी इससे .. .विश्वास ही नहीं हो रहा था ...एक ईमारत तो पूरी गोल थी..TV में DISNEY लैंड की गोल बिल्डिंग देखी थी ये बिलकुल वैसी ही थी ...आगे जा के एक और रिसेप्सन पड़ा वहां नाम रजिस्टर में दर्ज कर एक चाभी दे दी गयी ..और गार्ड को समझा दिया गया की कहाँ ले जाना है ...मजा तो बहुत आ रहा था पर सब अजीब सा भी लग रहा था ...तभी एक तख्ती पर एक लिस्ट दिखी ..जिसमें साथ ज्वाइन करने वालों के नाम थे..पढने लगे तो बस पढ़ते ही रह गए..एक-दो नहीं पूरे ५ अभिषेक मेरे नाम के साथ थे...पूरे ७५० नाम थे और आधे नहीं तो कम से कम एक तिहाई लडकियां तो थी ...लिस्ट पढ़ते ही कुछ अजीब सा लगने लगा. ..सब दोस्त यार जिनोंहे माना किया था IT में न जाने की सलाह दी थी ...याद आने लगे थे .....
ये समझ तो आ रहा था की इतने लोग गेस्ट हाउस में तो नहीं रुके होंगे..फिर आकिर सब हैं कहाँ ..
गाडी फिर चल दी और फिर एक के बाद एक इमारतें..पुछा तो पाता चला यहीं रहना है अब ३-४ महीने ..अच्छा लगा अजीब भी ..हॉस्टल पहुंचे ...सामान भारी था..पर किसी तरह ३ मंजिल तक ले गए..दरवाज़ा खोला..स्विच ऑन किये....बिजली नदारद...गुस्से से तमतमा उठे..जोर जोर से गार्ड गार्ड चिल्लाया....वो दौड़ता हुआ आया और समझ गया कुछ गड़बड़ है..मैंने कहा... ये पॉवर नहीं है यहाँ..वो सकपका के बोला... सर वेट करिए हाउस कीपिंग मेकानिक ५ मिनट में आ जायेगा....सुन के गुस्सा ठंडा हुआ..दुबारा जा के मेन स्विच चेक किया.. अगर फुज उड़ गया हो तो खुद ही ठीक कर लेते पर यहाँ तो कुछ और ही चक्कर था ..मेकनिक ५ मिनट से कम में ही आ गया ..और बोला ... सर क्या हुआ ..हमने कहा तुम देखो .स्विच ऑन है पैर लाइट नहीं जल रही ...वो हस्ते हुए बोला ...अरे सर आप ने स्विच में चाभी नहीं लगायी है ...शर्म सी आई ..ऐसा न था की ऐसे स्विच देखे ही नहीं थे ..पर हाँ कभी खुद चाभी भी नहीं लगायी थी ...अब समझ में आया की ये दुनिया कुछ हाई फाई हाई थी ..चाभी का छला फ़साने से स्विच ऑन होता था ...लाइट जली तो हैरानी और भी बढ़ गयी..रूम में फ़ोन, टीवी,२ बेड, ४ कुर्सियां ,३ मेंज, २ लोक्कर, ३-४ अलमारियां , खिडकियों पे आलीशान परदे , स्प्लिट AC ,एक इलेक्ट्रिक टी कैटल ,एक आएरून बॉक्स और शानदार अटेच्ड बाथरूम था ...वाह क्या बात थी ..उफ़ जो सोचा उससे कहीं जादा था ..अब समय आ गया था की दुबारा घर फ़ोन करें ..और सब बकाहन कर डालें , बता दें की क्या पाया है ...किया ..और खुश हुए ...
वहां बस ऐश करनी थी ..करी ..पर आप तो जानते ही हैं कि... जादा घी हज़म कहाँ होता है ..फ़िज़ूल में MBA का फितूर .. सब छोर करना ही था... तो वो भी किया..आखिर अपने आगे हमने किसी कि कभी सुनी कहाँ ....
बातें और भी हैं बताने को ..असली मस्ती तो अगले दिन से शुरू हुई थी ..पर बाद में कभी लिखेंगे ....
पर समय तो बीत ही जाता है ..बीत रहा है ...पर वो ऐश अब कहाँ ...