रेखा कि उम्र ८ साल होगी. रेखा कि दुनिया बहुत सीमित है . पर रेखा बहुत तेज़ तत्पर और खुश है
वो ये नहीं जानती कि गरीबी रेखा क्या है वो तो ये तक नहीं जानती कि वो किस दिन कब खाना खाती है
उसे तो बस खेलने कूदने और खुश रहने कि आदत है ..कितनी अच्छी है ये ..अभी दुनिया कि उन सब बुरी परछाईयों से दूर है जो इंसान को इंसान से दूर करती हैं ..
दिन के १० बजे होंगे और में अपने पुस्तैनी घर या कहिये फ़ार्महाउस पहुंचा ..ये बनारस के पास एक गाँव है..यहाँ पहुँचते ही रेखा से मुलाकात हुई ..रेखा हमारे हरवाह कि नातिन है.. उसे देख के ऐसा लगा कि उससे खुस इंसान इस दुनिया में और कोई नहीं है ..तुरंत फूर्ती से अपनी नानी के साथ घर साफ़ करने में लग गयी..जहाँ हम अपने काम काज में लग गए वहां पास में आ कर वो कुछ खेलती रहती और अपने संगी साथियों को बताती कि मुन्सी जी आयें हैं ..हमारे मालिक हैं ...सुन के अजीब लगता ...पर क्या करें ये सिलसिला हमारे दादाजी के ज़माने से चला आ रहा है..उनकी जमींदारी थी ..और वो वकील भी थे ..तो गाँव भर उन्हें मुन्सी जी ही कहता ..और अब हमे भी ..हिसाब लगा कर देखा तो इस साल खेत से पैदावार पिछले साल से बहुत अच्छी हुई थी..और मजे कि बात ये थी कि गाँव के बाकि सभी खेतों से जादा हमारे खेत से गल्ला आ रहा था..हम लोग अब जादातर खेत किराये पर खेती के लिए देते थे और बस थोरा सा हिस्सा हरवाह को दे देते थे..जो आधिया पर फसल लगाता था ..
इधर हम काम निपटाते जा रहे थे..उधर लोग मिलने जुलने आते रहते..इन सब के बीच रेखा कि उत्सुकता तत्परता कम न पड़ती..कभी किसी के लिए मिठाई पानी लाना तो कभी चाय बनाना..और हर बार पिछली बार से जादा खुस..शाम जब रेखा से बात हुई..तो दंग रह गए ..बच्ची हमे बचा समझ ..गाँव की राजनीती समझा रही थी..कोन कैसा है.किसकी भैंस अच्छी है ..और किसका क्या किस्सा है..सब पढ़ा दिया उसने..येही नहीं..ये जताने के लिए कि वो जादा तेज है..एक पतली सी दिवार जिस पर एक पैर से खड़ा होनो भी मुश्किल था ..उस पर दौड़ के पार करने का मुकाबला कर दिया..हमने हर न मानी ..पर दौड़ के पूरा पार न कर पाए..बस फिर क्या था ..उसने झट से दौड़ कर दीवार पार करी...खूब हसी..और सबके पास जा जाकर ऐलान कर दिया ..कि उसने आज मुंशी जी को हरा दिया है...हारे तो थे ही हम...पर काफी मनन करने पर विवश कर दिया उस छोटी से लड़की ने ...आखिर इंसान जैसे जैसे बड़ा होता है..खुशियाँ कहीं दूर चली जाती हैं ..और परेशां रहने लगता हाई ..आखिर क्यूँ ...क्या बस इसलिए कि वो मुन्सी जी के साथ दौड़ का मुकाबला नहीं कर सकता ?
Sunday, May 2, 2010
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nice bachpan ki yaad aa gai kash sabhi rekha hi bane reh pate
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